स्वामी विवेकानन्द
लेखक : विनोद
कङ्मीरी गेठ, दिल्ली
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राजपाल एण्ड स
मूल्य : एक रुपया (1:00) © © राजपाल एण्ड सन्ज, दिल्ली
शिक्षा भारती प्रेस, शाहदरा, दिल्ली, में मुद्रित SWAMI VIVEKANAND (Biography) By Vinod
स्वामी विवेकानन्द
भारत के भ्राध्यात्मिक श्रादशों को विश्व-भर में प्रकाशित करने का सबसे अग्रणी काम स्वामी विवेका- नन्द ने ही किया था; इसलिए आपका यश भारत की सीमाओं में ही नहीं, विश्व-भर में फेला हुआ है। स्वामी विवेकानन्द ने आज के युग की भाषा में भारत के प्राचीन ऋषियों के ज्ञान को संसार के सामने रखा था । इससे पूवं, पश्चिम के विचारकों को भारत के अतीत गौरव ग्रौर उसके ऊंचे आध्यात्मिक areal का कोई ज्ञान नहीं था । स्वामी विवेकानन्द ने उनकी आंखें खोल दीं । इस उपकार के लिए भारत के कोटि-कोटि जन सदा उनके ग्राभारी LST भारत के इतिहास में स्वामी विवेकानन्द का नाम सदा अमर रहेगा |
ईस्वी सन् १८९३ की शिकागो की सर्वेधर्म-परिषद् से पहले स्वामी विवेकानन्द के नाम से बहुत कम लोग परिचित थे । इस परिषद् की पहली बेठक में ही आपका
¥ स्वामी विवेकानन्द यश अचानक सूर्य को तरह एक ही दिन में सब जगह फेल गया । संसार के विचारक उनके पूर्व जीवन को घटनाश्रों को जानने के लिए उत्सुक हो गए ।
स्वामीजी एक ही दिन में श्रकस्मात् इतने प्रभाव- शाली नहीं हो गए थे । महापुरुषों की महानता के पीछे सदेव कठोर तपस्या होती है । वर्षों की कठिन साधना RIX अभ्यास के बाद उनके जीवन में आकर्षण आता है, जो चुम्बक की तरह लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है । स्वामी विवेकानन्द का यश भी वर्षो की कठिन साधना का परिणाम था । यहां हम उनके यशस्वी जीवन की कुछ घटनाएं देते हैं, जिससे उनको सफलता का रहस्य स्पष्ट हो जाएगा ।
बालक विवेकानन्द
स्वामीजी के पिता श्री विइवनाथदत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के सफल वकील थे । वकालत में पर्याप्त धन मिलता था, किसी बात की कमी नहीं थी । आप स्वयं उदार और दानी थे । ग्रतिथि-सेवा में आनन्द लेते थे। घर में हर समय अतिथियों का ग्राना-जाना लगा रहता था |
स्वामीजी की माता भुवनेसवरीदेवी की दो सन्ताने
स्वामी विवेकानन्द y SOOO ene esos eee थीं; किन्तु दोनों qfaat थीं । पुत्र की कामना से उनकी माता ने देवी-देवताश्रों का बहुत पुजन किया । Seat ने उनकी प्रार्थना सुन ली । इतनी साधनाश्रों के बाद जिस बालक का जन्म हुश्रा, वही पीछे विवेकानन्द कहलाया । ईस्वी सन् १८६३ की १२ जनवरी को सुबह ६ बजे उनका जन्म हुआ था । उनका नाम नरेन्द्र रखा गया । किन्तु माता उसे सदा विद्वेश्वर नाम से पुकारती थी । mit संसार में वही स्वामी विवेकानन्द नाम से प्रसिद्ध हुआ । माता उसे विश्वेश्वर नाम से इसलिए बुलाती थीं कि उन्हें विश्वेश्वर भगवान् की अपार दया से यह बालक प्राप्त हुआ था । इसके लिए उन्होंने भगवान् का बहुत पूजन-आराधन किया था । बचपन में नरेन्द्र बहुत नटखट बालक था | पड़ोस के बालकों पर प्रभुत्व जमाने में उसे कोई कठिनाई नहीं होतो थो । उसे घोड़ागाड़ी की सवारी का बहुत शौक था । घोड़ों से भौ प्रेम था । एक दिन पिताजी ने पुछा “नरेन्द्र, बड़ा होकर तू FAT करेगा?” नरेन्द्र ने बडी गम्भीरता से उत्तर दिया-- बड़ा होकर साईस बनूंगा या गाडीवाला कोचवान ।' नरेन्द्र के घर में पूजा-पाठ चलता ही रहता था |
द स्थामी विवेकानन्द
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माताजी को पुराण, रामायण, महाभारत की कथा सुनना अ्रच्छा लगता था । कथावाचक ग्राते रहते थे । नरेन्द्र भी बड़े ध्यान से इन कथाश्रों को सुना करता था । ये कथाएं उसे कण्ठस्थ-सी हो गई थीं । एक दिन उसने कथावाचक से सुना कि हनुमान् कदलीवन में रहते थे और वे HAT थे | इसपर बालक नरेन्द्र के मन में भ्रमर हनुमानजी के दशनों की इच्छा जागरित हो गई | उसी रात नरेन्द्र केलों की भाड में हनुमानजी की प्रतीक्षा में AST रहा । श्रांधी रात तक बैठने के बाद भी जब हनुमानजी के दर्शन न हुए तो उसे बड़ी निराशा हुई ।
पांच वर्ष की अवस्था में ही नरेन्द्र को पाठशाला भेज दिया गया। पाठशाला का नाम था मेट्रोपोलिटन इन्स्टीच्यूट' |
बचपन में ही ग्राप कितने निर्भय थे, यह निम्न घटना से पता लगता है। उस समय आपकी आयु वर्ष के लगभग थी । एक मेले से श्राप घर लौट रहे थे। आपके सामने एक बालक घोडागाडी के नीचे AA लगा। था । आपने उसे अपनी जान पर खेलकर बचा लिया | एक क्षण की और देर हो जाती और ग्राप उसे हाथ पकड़कर अपनी ओर न खींच लेते तो उसके प्राण न बचते। माताजी भुवनेश्वरीदेवी को जब यह घटना
स्वामी विवेकानन्द : ७ लवक 1 मालम हई तो उन्हें अपार आनन्द हुआ | उन्होने बालक नरेन्द्र को श्राशीर्वाद दिया- “भगवान् करे तेरे हाथों मनुष्य जाति का कल्याण होता रहे! इसी वीरता से जीवन के सब काम करना !” बालक नरेन्द्र की निर्भयता की अनेक कहानियां प्रसिद्ध हैं । नरेन्द्र के घर के सामने उसके एक मित्र का घर था। उसके आंगन में चम्पा का वृक्ष था । बच्चे उस वक्ष पर झला डालना चाहते Al लेकिन चम्या के वृक्ष की डालियां मज़बूत नहीं होतीं, इसीलिए बच्चों को झला डालने से रोका गया । फिर भी वे न माने । तब घर के मालिक ने उन्हे यह कहा कि इस वृक्ष पर ब्रह्मराक्षस रहता है। ब्रह्मराक्षस के ATA से बालक डर गए । नरेन्द्र को भी ब्रह्मराक्षस से डराया गया। लेकिन नरेन्द्र नहीं डरा । वह उस वृक्ष पर चढ़ गया और अपने साथियों से बोला--“ब्रह्मराक्षस होता तो सुभे खा न जाता ? यह तो केवल हमें डराने की झूठी बात बनाई गई है। नरेन्द्र अपनी कक्षा मे बहुत होशियार बालक नहीं था। पुस्तक-ज्ञान की ओर उसकी रुचि नहीं थो । थोडी देर पाठशाला में बैठने के बाद वह सारा दिन खेल-कद में बिता देता था । पाठशाला के पास बालकों ने एक अखाड़ा खोला था, उसमें Haat होती थीं ।
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नरेन्द्र को भी व्यायाम में रुचि थी । नियमित रूप से उसने व्यायाम करना शुरू कर दिया। इसीलिए स्वामी विवेकानन्द का शारीरिक गठन आदर्श था । बचपन के व्यायाम ने उनके शरीर को बहुत सुडौल बना दिया ।
सन् १८७६ में बालक नरेद्र ने स्कूल को शिक्षा समाप्त कर ली । मैट्रिक की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया |
मन्त्र-दीक्षा
ईस्वी सन् १८७९ में मेट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद नरेन्द्रनाथ कलकत्ता के 'जनरल ग्रसेम्बली' नाम के कालेज में दाखिल हुए। कालेज में रहकर आपने इतिहास, साहित्य, दर्शन आदि पाठ्य-ग्रन्थों का पारायण कर लिया। उनकी प्रखर प्रतिभा, सुन्दर शरीर और बातचीत के श्राकर्षक ढंग ने उन्हें समस्त कालेज में लोकप्रिय बना दिया था । आपका किसी से भी द्वेष नहीं था । प्रत्येक के दुःख को बंटाने के लिए AT उद्यत रहते थे।
धर्म की मीमांसा मन में बचपन से ही थी । ईश्वर के रूप-गुण, भ्रस्तित्व-नास्तित्व ग्रादि की चर्चा आप ग्रपने कालेज-काल के मित्र डा० ब्रजेन्द्रनाथ से प्रायः किया करते थे । एक दिन दर्शनों पर बातचीत करते
स्वामी विवेकानन्द &
हुए श्रापने ईश्वर के सच्चे स्वरूप को देखने की उत्कट इच्छा प्रकट को । सत्य की शोध में श्राप दुनिया की सब श्राकांक्षाएं भूल गए । उन दिनों कलकत्ता शहर में ब्रह्मसमाज पूरे जोश पर था | उस समाज में भी श्रनेक वर्गं थे । श्री केशवचन्द्र सेन का भाषण सुनने के बाद आपका विचार उनके वर्ग में जाने को उत्सुक हो गया था । इच्छा हुई केशवचन्द्र द्वारा स्थापित नवीन ब्रह्म- समाज में जाने को। वहां महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर से भी आपने उपदेश सुने ।
इतने पर भी उनका मन शान्त नहीं हुआ । ग्रापने केशवचन्द्र द्वारा स्थापित ब्रह्मसमाज में योग दिया ।
किन्तु, किसी स्थान पर भी आपको ईइवर-विषयक जिज्ञासा शान्त नहीं gal जो भी ईश्वर के अस्तित्व का विशवास दिलाता, उससे आप यही पूछते थे -
“आपने ईश्वर को देखा हे? '
नरेन्द्राथ सभी धर्मगुरुओं के पास हो आए और
. सबसे यही पूछा ।
युवक के इस प्रश्न के उत्तर में कोई हंस देता और कोई उसकी नादानी पर दुःख प्रकट करता । किन्तु युवक का मन इस प्रश्न का समाधान पाने के लिए दिन-प्रतिदिन चंचल होता जाता था ।
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्रन्त में युवक नरेन्द्र को एक गुरु ऐसा मिल गया जिसने उसकी शंका का सन्तोषजनक समाधान कर दिया। उनका नाम था श्रीरामकृष्ण परमहंस देव । परमहंस एक दिन नरेन्द्र के पड़ोसवाले घर में अतिथि बनकर ग्राए थे । नरेन्द्र ने परमहंस का नाम सुना था । उनसे भेंट करने के लिए वह पड़ोसी के मकान पर गया | वहां उसने एक SAC TTA का भजन सुनाया | परम- हंस उसे सुनकर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने नरेन्द्र को दक्षिणेश्वर ग्राने का निमन्त्रण दिया।
नरेन्द्र उस समय कालेज में पढ़ते थे । परीक्षा की तैयारियां हो रही थीं, इसलिए वे इस निमन्त्रण की बात भूल गए | किन्तु कालेज की प्रथम वर्ष की परीक्षा के बाद अपने पिता श्री विश्वनाथ बाबू के एक पुराने मित्र डा० रामचन्द्रदत्त के साथ ATT दक्षिणेवर जाकर श्री रामकृष्ण परमहंस से भेंट करने गए ।
दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण जी तरेन्द्रनाथ से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे एकान्त में बुलाकर उससे बहुत स्नेहपूर्वक कहा--
“तू मुझसे मिलने का वचन देकर भूल गया, किन्तु मैं तो यहां प्रतिदिन तेरी राह देखता रहा।
संसारी लोगों से बातें करते-करते मेरी आत्मा बहुत
दुःखी हो गई। आज तेरे सदृश त्यागी पुरुष से भेंट
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करते हुए मेरी श्रात्मा को भ्रपार आनन्द हो रहा है।”
यह कहते-कहते उनकी आंखों से स्नेह के श्रांसुश्रों की धारा बह चली । नरेन्द्र भी आइचय से परमहंसजी की ओर देखता ही रह गया; कोई उत्तर न दे सका । परमहंसजी फिर कहने लगे
“तू कोई साधारण मनुष्य नहीं है। भगवान् ने तुझे मानव-जाति के कल्याण के लिए भेजा है। मुझे मालूम है, तू भगवान् का वरद पुत्र है? तेरे हाथों जगत् का कल्याण होने वाला है । मुझे इसका ज्ञान है तुझे नहीं ।”
घर WHC परमहंस के शब्द नरेन्द्र की आत्मा में THAT रहे । उसके मन में यह शंका उठी कि परमहंस की उक्ति में कोई सार नहीं, उन्होंने जो मन में आया बिना विचारे कह दिया । किन्तु उसे ध्यान आया कि परमहंसजी इतने भ्रविचारी नहीं हैं। ऐसा ही हो तो केशवचन्द्र सेन, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और विजय गोस्वामी अ्रादि विचारक seg पूजा व भक्ति की दृष्टि से क्यों देख ? हजारों लोग प्रतिदिन परमहंसजी के उपदेश सुनने श्राते थे, उनके प्रति श्रद्धा रखते थे। सभी लोगों की दृष्टि में परमहंसजी भ्रध्यात्मविद्या के शिखर पर पहुंचे हुए महात्मा थे ।
नरेन्द्र ने भी दक्षिणेश्वर जाकर उनसे उपदेश
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लेना प्रारम्भ कर दिया। नरेन्द्र के हृदय में परमहंसजी के प्रति भक्ति-भाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया |
एक दिन परमहंसजी से भी नरेन्द्र ने पूछ लिया--
“भगवन | आपने ईश्वर को देखा है?”
परमहंसजी ने हंसकर उत्तर दिया हां, मैने feat को देखा है । जिस तरह तू भ्रपनी aia को स्पष्ट रीति से देख सकता है, उसी तरह मैंने श्रपनी आंख में भगवान् को देखा है ।
इतनी कठिन बात को इतनी सरल रीति से कहने की योग्यता परमहंसजी में ही थी । अपने अनुभव के आधार पर ही कोई ऐसी बात कह सकता था । नरेन्द्र: नाथ परमहंसजी की इस सरलता पर मुग्ध हो गए | कुछ देर तक वे इस वाकय की थाह पाते हुए ग्रवाक्-से खड़े रहे । तब परमहंसजी ने बड़े स्नेह से नरेन्द्र की RIX देखते हुए कहा--
“यदि तू मेरे कहने के अनुसार आचरण करे तो तुझे भी ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं ।'
नरेन्द्र ने उसी दिन परमहंसजी को गुरु मान लिया | उसका जीवन भ्रध्यात्म की नई धारा में बहने लगा | परमहंसजी के कथनानुसार भजन-साधन करते- करते उसे विश्वास होने लगा कि एक दिन उसे Sear के दर्शन अवश्य होंगे । गुरु परमहंसजी भी नरेन्द्र के
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०००० ee स्नेह में डूब गए । उन्हें इस शिष्य के प्रति अगाध प्रेम था । अपने शिष्यों से वे परोक्ष में कहा करते थे-- नरेन्द्र तो नारायण हे । उसके हृदय, मन, प्राण
बहुत निर्मल हैं |
किसी कारण नरेन्द्र यदि कुछ दिन परमहंसजी के दशन को नहीं जा सकता था, तो परमहंसजी स्वः उससे मिलने को कलकत्ता आ जाया करते । इन्हीं वि नरेन्द्र के पिताजी की मृत्यु हो गई।
पिता के स्वर्गवास के बाद विधवा माता और दो छोटे भाइयों के रक्षण, भरण-पोषण का भार नरेन्द्र के कन्धों पर पड़ा । नरेन्द्र उन दिनों बी० ए० की परीक्षा में बेठा था । भाइयों के भरण-पोषण के लिए नौकरी की तलाश की, किन्तु सन्तोषजनक नौकरी नहीं मिली | इससे नरेन्द्र को बहुत दुःख हुआ। भगवान् पर क्रोध भी आया | नरेन्द्र ने सोचा, भगवान् को दयालु कहना व्यर्थ हे । उसके दिल में दया हो तो वह उसे इतने कष्ट कभी न दे। इन्हीं शंकाशओओों में डूबा हुआ नरेन्द्र फिर गुरु की शरण में गया और गुरुजी से विनती को-- “आप मेरे लिए काली माता से वरदान मांगे कि मेरा ग्राथिक कष्ट दूर हो जाए।” परमहंसजी ने कहा--
“माता से जो मांगना है तू स्वयं निःसंकोच मांग ले, वे तेरे दुःखों को जानती हैं 1”
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वहां से नरेन्द्र मन्दिर में गए और अपने लिए धन की भिक्षा मांगने के स्थान पर यह मांग श्राए--“देवी, मुझे ऐसी बृद्धि और भक्ति दे कि तेरे दर्शन कर AHN"
इन दिनों नरेन्द्र की इच्छा हुई कि वह संन्यास ले श्रौर पर्वत की गुफा में जाकर तब तक तपस्या करे जब तक ईश्वर का साक्षात् दर्शन न हो जाए । नरेन्द्र ने यह इच्छा परमहंसजी के सामने प्रकट की तो उन्होंने कहा
“नरेन्द्र, तू स्वार्थी मनुष्यों की तरह केवल श्रपनी मुक्ति की इच्छा कर रहा है ! संसार में लाखों मनुष्य दुःखी हैं। उनका दुःख दूर करने तू नहीं जाएगा तो कौन जाएगा ?
परमहंसजी ने यह भी कहा कि--
“संसार में जितने मत हैं उतने ही पंथ हैं। सब धर्म AAI मार्ग को सच्चा बतलाते हैं । सचाई यह है कि सभी धर्म सच्चे हैं। किसी भी धर्म-विहित Baal पर आचरण करने से मनुष्य का कल्याण हो सकता है । सभी धर्म एक ही ग्रादर्शों का प्रतिपादन करते हैं | संसारवाले इस बात को नहीं समझते, इसी- लिए उनमें कलह होता है | मैं चाहता हूं कि तू संसार में जाकर सबको यह ज्ञान दे कि सब धर्म एक समान सच्चे हैं। किसी धर्म को तिरस्कार की दृष्टि से नहीं
स्वामी विवेकानन्द १५ +०-००-०-५०००००००० ०० २ een an देखना चाहिए ।”
पहले नरेन्द्रनाथ को ऐसा प्रतीत हुआ कि परम- हंसजी का यह सन्देश संसार को सुनाना बहुत कठिन काम हे । उन्हें शंका थो कि उनकी बात को कौन सुनेगा ? नरेन्द्र ने सोचा वह एक साधारण-सा मनुष्य है । तप और ज्ञान का कोई विशेष बल उसके पास नहीं है । तब उसकी बात पर ध्यान ही कौन देगा ? किन्तु गुरुजी के बल पर उसने यह प्रण कर लिया और इसे ही श्रपने जीवन का ध्येय बना लिया ।
नरेन्द्र की प्रबल इच्छा थी कि वह समाधि का ग्रनुभव करे । परमहंसजी बहुत बार समाधिस्थ हो जाते थे । नरेन्द्र उनसे समाधि-ग्रवस्था का वर्णन पूछता था mie स्वयं समाधि का अनुभव लेने की इच्छा प्रकट करता था । परमहंसजी उसके प्रश्न को भविष्य के लिए टाल देते थे ।
परमहंसजी की समाधि-भ्रवस्था की चर्चा करते हुए उनके भक्त श्री नगेन्द्रनाथ गुप्त ने अनुभव की एक बात अपने संस्मरण में इस प्रकार लिखी है-
“यह ईस्वी सन् १८८१ की घटना है । मैं केशव- चन्द्र सेन तथा अन्य कई मित्रों के साथ परमहंसजो से भेंट करने गया | हमारी प्रार्थना पर परमहंसजी एक दिन समीप की नदी में ठहरी नाव पर स्वयं पथारे ।
१६ स्वामी विवेकानन्द मी की TN lessees वह नाव केशवचन्द्र के दामाद व कूचविहार के महाराज नृपेन्द्रनारायण के पुत्र की थी। वहां भगवान् के रूप के विषय में केशवचन्द्रजी ग्रौर परमहंसजी में वार्तालाप होता रहा । तब परमहंसजी भगवान् के निराकार होने का समर्थन कर रहे थे । बातचीत के दोरान में ही उन्होने 'निराकार, निराकार, निराकार' शब्द को तीन बार दोहराया और समाधिस्थ हो गए । समाधि की अवस्था में उनके होंठों पर मुस्कराहट की रेखा खिच गई थी और सारा शरीर निष्कम्प हो गया था । आंखें ग्रर्धेनिमीलित रह गई थीं, राधो बन्द पलकों में से निश्चल पुतली स्पष्ट दिखलाई देती थी । चेहरे पर दिव्य ग्राभा झलक उठी थी । कुछ क्षण हम सब मन्त्र- मुग्ध-से होकर उनकी समाधि देखते रहे। बाद में त्रिलोकनाथ सान्याल ने भक्ति का गीत गाया । गीत के wat में परमहंसजी की मुद्रा भंग हुई । उन्होंने धीरे-धीरे ग्रांखें खोली ।”
परमहंसजी की चर्चा सुनकर नरेन्द्र ने भी समाधि- अवस्था प्राप्त करने को प्राथना की । परमहंसजी ने उसे समझाते हुए कहा--“यह अनुभव तुम्हारे लिए कठिन है क्योंकि तुम्हारी प्रकृति राजसी है, सात्त्विकी नहीं | राजसी प्रकृतिवालों को कर्म करने में ही सन्तोष मानना चाहिए । समाधिस्थ होना सात्त्विक प्रकृतिवाले
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मनुष्यों को शोभा देता है ।”
किन्तु नरेन्द्र (स्वामी बिवेकानन्द) गुरुजी की इस उक्ति से निरुत्साह नहीं हुए । वे समाधिस्थ होने HT MAS करते ही रहे । तब परमहंसजी ने कहा-- “अच्छा, मैं तुझे समाधि का अनुभव अवश्य दूंगा 1” यह कहते ही विवेकानन्दजी पूर्ण समाधि में डूब गए । उनकी समाधि तब तक भंग न हुई जब तक परमहंसजी ने स्वयं उन्हें समाधि से नहीं जगाया |
कुछ दिन बाद नरेन्द्रनाथ ने श्रीरामकृष्ण परम- हंसजी से संन्यास की दीक्षा ले ली । नरेन्द्र के मित्रों ओर सम्बन्धियों ने उसे इस मार्ग पर चलने से बहुत रोका, किन्तु नरेन्द्र अपने प्रण पर Hee रहा | संन्यास लेने के बाद भी परमहंसजी ने स्वामी विवेकानन्द को यही उपदेश दिया था--
“संन्यास का उद्देश्य मुक्त होकर लोक-सेवा करना है । अपने ही मोक्ष की चिन्ता करनेवाला मनुष्य स्वार्थी होता है। लाखों लोग दुःखों के बन्धनों में जकड़े हुए हैं । उन्हें दुःखों से मुक्ति देना ही संन्यासी का सच्चा कतव्य है, यही उसका मोक्ष है। साधारण साधु- संन्यासियों की तरह एकान्त में भगवान् का भजन करने में अपने मूल्यवान् जीवन को नष्ट मत करना । भगवान् के दर्शन करने हों तो भगवान् के पुत्र मनुष्य-मात्र की
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सेवा करना । इस सेवा से सन्तुष्ट होकर ही भगवान् तुझे दर्शन देंगे ।”
ईस्वी सन् १८८६ में श्रीरामकृष्णजी परमहंस का स्वर्गवास हो गया | उसके बाद स्वामी विवेकानन्द भी कलकत्ता के उत्तर में स्थित वरादनगर के ग्राश्रम में आकर निवास करने लगे । वहां उन्होंने धामिक ग्रन्थों और दशेनशास्त्रों का दो वर्ष तक अभ्यास किया ।
स्वदेश-यात्रा
दो वर्ष तक शास्त्रों का अभ्यास तथा तपस्या करने के बाद स्वामीजी समस्त देश की यात्रा के लिए चल पड़े | पहले आप बिहार गए। बिहार में भ्रमण करते हुए ग्रापको एक दिन ग्रंग्रेज सरकार की पुलिस ने पकड़ लिया था । बात यह थी कि उन दिनों बिहार के गांवों में ग्राञ्रवृक्षों पर केसर का तिलक लगाने की प्रथा चल पड़ी थी । ग्रंग्रेज अफसरों ने इस केसरतिलक को राजद्रोहियों का कोई गुप्त चिह्न समझा । उन दिनों बंगाल व बिहार के राजद्रोहियों से सरकार बहुत भय- भीत थी । १८५७ के विप्लव से पूर्व भी विप्लवकारियों ने कुछ संकेतों द्वारा विप्लव की सूचना श्रपने साथियों को ऐसे ही दी थी। ग्रतः केसर के संकेत को भी विप्लव की
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पूर्वसूचना समभकर सरकार संकेत को छाप लगानेवाले की खोज कर रही थी । किन्तु बहुत छानबीन के बाद भी सरकार को कोई भ्रभियुक्त नहीं मिल रहा था ।
किसी ने ग्रंग्रेज अफसरों को यह सुझाव दिया कि यह काम देश-भर में निरुद्वेश्य घूमनेवाले साधुओं का है । विप्लववादी भी साधु के वेश में घुम-घूमकर आस्र वृक्षों पर यह संकेत अंकित कर रहे हैं । इस सुझाव का परिणाम यह हुआ कि बिहार-भर के साधुओं को पकड़- कर पूछताछ शुरू हो TE |
स्वामीजी उन दिनों संन्यासी थे । साधुवेश में वे भी बिहार का परिभ्रमण कर रहे थे। एक दिन वे एक गांव में जा रहे थे कि पीछे से एक घुडसवार सिपाही ने ललकारा । उनसे पुछा गया---आप कौन हैं ?” तो आपने कहा-“मैं विवेकानन्द हूं।” सिपाही एक खां साहब थे, उन्होंने विवेकानन्द का नाम नहीं सुना था; ललकारकर बोले
“विवेकानन्द कौन ?”
स्वामीजी ने कहा “मैं एक साधु हुं ।”
साधु शब्द सुनकर खां साहब का पारा चढ़ गया, TUT बोले--
“सब साधु बदमाश होते हें । तुम मेरे साथ कोतवाली तक चलो, जेल को हवा खाकर तुम्हें साधु
२० स्वामी विवेकानन्द बनने का मजा मिल जाएगा । तुम्हें जेल में रहना होगा।”
“कितने दिन ?” स्वामीजी ने शान्ति से पूछा ।
“पन्द्रह दिन, एक महीना, जितने दिन हम चाहेंगे 2”
स्वामीजी खां साहब के पास गए प्रौर बड़ी नम्रता से प्रार्थना-भरे शब्दों में कहा--
“खां साहब ! क्या श्राप मुझे छः महीने की केद नहीं दे सकते ? छः नहीं तो चार या कम से कम तीनः महीने को तो दे ही डालिए ।”
खां साहब बड़े चकराए। अचम्भे में भरकर उन्होंने पूछा—
“लुम एक महीने से अधिक समय के लिए जेल में क्यों रहना चाहते हो?”
“इसलिए कि जेल का जीवन यहां के जीवन से अधिक आराम का है। यहां तो सुबह से शाम तक चलते-चलते थक जाता हूं। जेल की मेहनत इतनी कड़ी नहीं है। यहां तो सुबह-शाम भोजन की भी निर्चिन्तता नहीं; कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता । आप मुझे जेल में डालकर सचमुच बड़ा उपकार करेंगे खां साहब, विश्वास रखिए।”
स्वामीजी को बात सुनकर खां साहब समझ गए कि ऐसा लापरवाह आदमी विप्लववादी नहीं हो सकता।
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स्वामीजी को मुक्त कर दिया गया।
उन दिनों स्वामीजी ने एक कठिन व्रत लिया था। वह यह कि वे सीधे चलते जाएंगे, कभी मुड़कर पीछे नहीं देखेंगे, किसी से भिक्षा नहीं मांगेगे श्रौर भोजन के लिए जब कोई स्वयं कहेगा, तभी उससे ग्रहण करेंगे! इस कठिन व्रत का परिणाम यह था कि कई दिन बिना अन्त ग्रहण किए बीत जाते थे।
एक दिन शाम को आप एक आदमी की घुड़साल के सामने से गुजर रहे थे। रास्ते पर एक साईस खड़ा था। पिछले दो दिनों से स्वामीजी ने अन्न ग्रहण नहीं किया था, चेहरे पर भूख की रेखाएं स्पष्ट खिच श्राई थीं। साईस ने उन्हें नमस्कार करके पुछा--“साधु बाबा, ग्राज खाना नहीं मिला क्या?”
स्वामीजी ने सरलता से उत्तर दिया-- नहीं, दो दिन से नहीं।”
तब साईस उन्हें प्रपने साथ अन्दर लिवा ले गया और वहां उसने अपने भाग की सूखी रोटियां खाने को दीं। साथ में थोड़ी-सी मिरचों की चटनी थी । दो दिन निराहार रहने के बाद पेट में जब सूखी रोटियां और मिरचे गईं तो पेट की ग्रंतड़ियों में भयंकर ददं उठा | साईस घबरा गया । किन्तु उसी समय नजदीक से एक तरबूज॑वाला गुजरा | तरबूज़वाले ने तरबुज की दो His
२२ स्वामी विवेकानन्द भेंट कीं। तरबूज़ के पानी ने पेट-दर्द को ठण्डा कर दिया, मिरचों की जलन शान्त हो गई । बिहार से चलकर श्राप उत्तरप्रदेश के कई शहरों में गए । काशी पहुंचकर उन्हें भ्रनुभव gar कि यहां भारतीय शास्त्रों का अ्रध्ययन किया जा सकता है। काशी के प्रख्यात तैलंग स्वामी श्री भास्करानन्द और पण्डित भूदेव मुखोपाध्याय के साथ श्राप कुछ दिन शास्त्र- चर्चा करते रहे । काशी भारतीय संस्कृति का केन्द्र है। यहां श्री विश्वताथ मन्दिर 'में भोग चढ़ाने के लिए भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, मद्रास व बंगाल, सभी प्रान्तों से भक्तजन आते हैं। भारतीय हृदय का यहां सच्चा दिग्दरन होता है । स्वामी विवेकानन्द को काशी के प्रवास ने समस्त भारत की विचारधाराश्रों से परिचित करा दिया । इससे श्रापका दृष्टिकोण विशाल हो गया । काशी से प्रयाग, अ्रयोध्या, आगरा भ्रादि ऐति- हासिक स्थानों का भी आपने परिश्रमण किया । उत्तर- प्रदेश के बाद आपने राजस्थान की रियासतों का भ्रमण किया | अलवर राज्य के दीवान से भेंट होने पर उसने स्वामीजी को अलवर पधारने का निमन्त्रण दिया । उन दिनों श्रलवर-नरेश अन्य देशी नरेशों की तरह, दिन- भर शिकार या शराब की धुन में रहते थे राजकार्य
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की ओर उनकी सर्वथा रुचि नहीं थी । धामिक कार्यो को वे शंका की दृष्टि से देखते थे ।
दीवान के कहने पर अलवर के राजा ने स्वामीजी को महलों में बुलाया और पूछा--
“स्वामीजी ? आप इतने विद्वान् हैं। चाहें तो मनमाना धन कमा सकते हैं, तब क्यों भिक्षा मांगते हैं ? अपने पुरुषार्थ से श्राप श्रपनी गुजर कर सकते हैं, दूसरों के सामने हाथ पसारने से मनुष्य दीन हो जाता हे ॥
स्वामीजी ने कहा--'पहले आप भी मेरे एक प्रश्न का उत्तर दीजिए । राजा होते हुए भी आप राज-कार्य में ध्यान नहीं देते। दिन-भर साहब लोगों के साथ शिकार खेलने व अन्य ग्रामोद-प्रमोद में समय क्यों नष्ट करते हैं ?
भ्रलवर-नरेश ने उत्तर दिया--मैं राजा हूं, जो मन में आता है, करता हूं ।'
स्वामीजी ने कहा--“मैं अपने मन का मालिक हूं, जो मन में आया करता हूं ।
यह बात तो स्वामीजी ने विनोद को रीति से कही थी । किन्तु सचाई यह थी कि वे भिक्षा मांगने को किसी के सामने हाथ पसारते ही नहीं थे दिन-भर लोक-सेवा करते थे और जो कुछ भक्त लोग स्वयं दे
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जाते उसीमें सन्तुष्ट रहते थे ।
अलवर राज्य में बहुत धर्मोपदेश करने के बाद आपने राजपूताना तथा गुजरात के कई तीर्थो का भ्रमण किया । इसी भ्रमण के बीच ग्रहमदाबाद भी पहुंचे । वहां के स्वर्गवासी जज लालशंकर उमियाशंकर के घर अतिथि रहे। ग्रहमदाबाद से श्राप लिबड़ी गए । लिबड़ी के ठाकुर साहब ने स्वामीजी का खूब सत्कार किया । ठाकुर साहब की वेदान्त में रुचि थी । आप स्वामीजी के शिष्य बन गए । वहां से जूनागढ, भावनगर आदि रियासतों में गए । जूनागढ़ में दीवान साहब स्व० हरिदास बिहारीदास के अतिथि बने । दीवानजी ग्रापके भक्त बन गए । रियासत के ग्रन्य श्रधिकारी भी रोज शाम को स्वामीजी के दशनों को जाते थे । जूनागढ़ से आप वेरावल, सोमनाथ और पाटन भी गए । पाटन से पोरबन्दर पहुंचे । पोरबन्दर में श्री शंकर पाण्डुरंग जी से भी आपने वेदान्त को कुछ शिक्षा ली, पाण्डुरंग जी ने कहा कि यदि आप यूरोप व अमेरिका जाएं तो विद्वत्ता का सम्मान हो सकता है ।
पोरबन्दर से स्वामीजी द्वारिका गए । वहां शारदा मठ के श्रीमान् शंकराचा्येजी के भ्रतिथि बने । यहां से मांडवी, भुज, पालीताना आदि स्थानों का पर्यटन करते हुए आप बड़ौदा पहुंच गए । बड़ोदा में कुछ दिन रहने
स्वामी विवेकानन्द २५
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के बाद आप बम्बई और पुना भी गए । पूना में लोक- मान्य बालगंगाधर तिलक से भेंट हुई । पूना से मैसूर के लिए चल पडे । मैसूर में राज्य के महाराज और दीवान ने खूब सत्कार किया | वहां श्रापको राजमहलों में ही निवास करने को बाध्य किया गया । मैसूर से चलते समय मैसूर-नरेश ने कुछ दक्षिणा स्वामीजी को अर्पण की । स्वामीजी बोले--
“महाराज, मैं तो संन्यासी हूं, धन-दौलत का मेरे लिए कोई उपयोग नहीं । यही धन गरीबों में बांट दीजिए |”
महाराज से विदा लेकर स्वामीजी सेतुबन्ध रामेश्वर गए । रामेशवर दक्षिण भारत का काशी कहलाता है; वहां के विशाल मन्दिर भी काशी के मन्दिरों के समान ही भव्य हैं ।
रामेश्वर से आप पाण्डिचेरी भी गए। वहां मद्रास सरकार के एक ऊंचे अधिकारी श्री मन्मथनाथ भट्टाचार्य से आपकी भेंट हो गई। भट्टाचार्य के निमन्त्रण पर आप मद्रास पहुंचे । `
मद्रास में बहुत-से युवक आपके प्रवचन सुनने के लिए एकत्र होते थे, उनमें से बहुत-से आपके WAT भक्त बन गए । मद्रास के ईसाई-कालेज के एक अध्यापक श्रीयुत सिंगराबेलू मुदलियार महाशय नास्तिक थे।
२६ स्वामी विवेकानन्द धर्म भ्रोर ईश्वर पर उनकी आस्था नहीं थी । एक दिन स्वामीजी के साथ वाद-विवाद करते-करते उनका मत- परिवर्तन हो गया । उसी दिन से वे आस्तिक बन गए श्रौर स्वामीजी के भक्त भी ।
इन्हीं दिनों अमेरिका के कुछ धर्मे-धुरन्धरों की ओर से शिकागो में विश्व-भर के विभिन्न धर्मों की परिषद् होने की घोषणा की गई। परिषद् का उद्देश्य विभिन्न धर्मो के विविध मन्तव्यो का एकसाथ समन्वय करना था । प्रत्येक धर्म की ओर से कुछ प्रतिनिधि भ्रानेवाले थे, जिनका काम अपने धार्मिक विइवासों की व्याख्या परिषद् के सम्मुख करना था ।
स्वामीजी के शिष्यों ने उनसे इस परिषद् में भाग लेने का आग्रह किया। स्वामीजी हिन्दू-शास्त्र के विद्वान् होने के साथ अंग्रेजी के भी अद्वितीय पण्डित थे । हिन्दू- धर्म के प्रतिनिधित्व के लिए उनसे ग्रच्छा great नहीं मिल सकता था।
अपने भक्तों का श्राग्रह मानकर स्वामीजी ने शिकागो जाने की सहमति दे दी। जहाज ३१ मई, सन् १८९३ के दिन श्रमेरिका के लिए रवाना हो गया ।
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अमेरिका और इंग्लैंड में हिन्दू-संस्कृति का प्रचार
शिकागो पहुंचकर स्वामीजी को कुछ दिन बहु परेशान होना पडा । वहां के वासियों से बहुत कम जान- पहचान थी । किसी विशेष संस्था द्वारा प्रेषित प्रतिनिधि न होने के कारण परिषद् के संचालकों ने भी आपका उचित स्वागत नहीं किया था। धन की सहायता भी बहुत परिमित थी । अमेरिका के खर्चे बहुत थे । स्वामीजी मार्ग-व्यय साथ में ले श्राए थे, वह समाप्त हो गया। परिषद् प्रारम्भ होने में अभी कुछ दिन शेष थे । स्वामीजी की परिषद् में भाग लेने की प्रबल इच्छा थी । किन्तु तब तक प्रतीक्षा करने के लिए साधनों को ग्रावव्यकता थी । इस ग्रर्थ-समस्या को हल करने के लिए स्वामीजी ने एक उपाय सोचा । शिकागो नगर के खर्चो से बचने का यही उपाय था कि आप आसपास के किसी उपनगर में चले जाते । उपनगर जाने की बात सोच ही रहे थे कि एक सज्जन से भेंट हो गई । वह उन्हें अपने घर ले गया । वहां आपकी भेंट हावडे युनिवसिटी के एक प्रोफेसर Ho ए० राइट से हुई । स्वामीजी की बातचीत से प्रोफेसर .बहुत प्रसन्न हुआ |
२५ स्वामी विवेकानन्द
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उसे श्रनुभव हुआ कि स्वामीजी से भ्रधिक विद्वान् भार- तीय भ्राज तक श्रमेरिका में नहीं आया था । उसने स्वामीजी से श्राग्रह किया कि वे ग्रागामी सर्वंधर्म-परिषद् में हिन्दू-धर्म का प्रतिनिधित्व श्रवश्य करें | स्वामीजी ने कहा--
“किन्तु मेरे पास हिन्दू-धर्म के प्रतिनिधि होने का कोई प्रमाण-पत्र नहीं है । मैं हिन्दू-धर्म की श्रोर से यहां भेजा भी नहीं गया । यहां तो मैं निजी तौर पर आया हूँ । wa: परिषद् के भ्रधिकारी मुझे हिन्दू-धर्म का प्रतिनिधि स्वीकार नहीं करेंगे ।”
- प्रोफेसर ने स्वामीजी को ्राइवासन दिया कि वह
परिषद् के अधिकारियों को इस सम्बन्ध में पत्र लिखेगा
“और उन्हें हिन्दू-धर्म के प्रतिनिधि के रूप में परिषद् में भाग लेने की अनुमति दिलवा देगा ।
प्रोफेसर राइट के आइवासन से स्वामीजी को कुछ
` धीरज हुआ । किन्तु अ्र्थ-कष्ट तो वैसा ही बना था । उस दिन उपनगर से जब आप शिकागो नगर में ग्राए तो होटल में जगह नहीं मिली । होटलवाले ने उन्हें तिरस्कार से उत्तर दिया । शिकागो की बर्फीली रात में स्वामीजी feat रहे थे । कोई अन्य आश्रय न पाकर आपने रेलवे स्टेशन की बेंच पर रात काटी । वहां से उठकर वे भुखे-प्यासे सड़क के किनारे बैठ गए उन्होंने
स्वामी विवेकानन्द २६
सोचा--'ग्राज भगवान् को मेरी मृत्यु ही श्रभीष्ट हे ।' इसी चिन्ता में बेठे थे कि सामने से एक महिला ने उन्हें इस तरह थके-हारे बेठा देखकर अपने पास बुलाया। स्वामीजी ने अपना वृत्तान्त कह सुनाया । महिला के दिल में दया आई । उसने स्वामीजी का उचित सत्कार किया । उस महिला की कृपा से स्वामीजी को भविष्य में इतनी विकट परिस्थिति का सामना नहीं करता पड़ा ।
इतने में धर्म-परिषद् आरम्भ हो गई । परिषद् में संसार-भर के धर्मो के धुरन्धर वक्ता-प्रवकता उपस्थित थे । स्वामीजी को भी हावडं युनिवसिटी के प्रोफेसर की प्रेरणा पर परिषद् में उपस्थित होने की अनुमति मिल गई थी । परिषद् में हिन्दू-धम का कोई अन्य - प्रतिनिधि नहीं था । हिन्दुओं में दर्जनों मत-सतान्तरों के कारण कोई एक हिन्दू उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सका था | मत-मतान्तरों में प्रतिनिधि भेजने के सम्बन्ध . में कोई निर्णय नहीं हो पाया था । अतः स्वामीजी ही ' हिन्दू-धर्म के स्वयं मनोनीत प्रतिनिधि थे ।
स्वामीजी परिषद् में उपस्थित सब प्रतिनिधियों से छोठे थे । ग्रभी आपकी श्रायु केवल ३० वर्ष की थी । किसी को विशवास नहीं होता था कि यह नवयुवक परिषद् के विद्वानों के सम्मुख कुछ भी वक्तव्य दे
३० स्वामी विवेकानन्द वि न SESE SC सकेगा | स्वामी विवेकानन्द स्वयं भी शंकित थे, क्योंकि इससे पूर्व आपने इतने विद्वानों में कभी भाषण नहीं दिया था । परिषद् में दस हज़ार से ग्रधिक लोग उप- स्थित थे । इतनी बड़ी सभा में श्राप कभी भाषण देने खड़े नहीं हुए थे ।
किन्तु भाषण के प्रारम्भ में ही जब आपने अमे- रिका को उपस्थित जनता को 'भाइयो और बहिनो के नाम से सम्बोधित किया तो सब लोग इस सम्बोधन पर मुग्ध हो गए । सभाभवन तालियों से गूंज उठा । स्वामीजी के भाषण का ATE ही यह था कि सब धर्मों का स्रोत एक है, विश्व के सभी मनुष्य परस्पर मानव-धर्म के सूत्र में बंधे हुए भाई-बहिन हैं । धर्म या देश को भिन्नता के कारण ही उन्हें भिन्न नहीं कहा जा सकता ।
आपके भाषण ने परिषद् की रूपरेखा ही बदल डाली । परिषद् की ग्रायोजना तो हुई थी प्रत्येक धर्म की जुदा-जुदा विशेषताओं के वर्गीकरण के लिए, किन्तु स्वामी विवेकानन्द ने कान्फेंस का उद्देश्य प्रत्येक धर्म के एक ही बिन्दु पर केन्द्रीकरण का बना दिया । यह उद्देश्य इतना विशाल और आकर्षक था कि न केवल परिषद् में उपस्थित प्रतिनिधियों ने एक स्वर से स्वामी विवेकानन्द की प्रतिभा को सराहा, बल्कि अमेरिका के
स्वामी विवेकानन्द ३१ सभी पत्रों ने भी स्वामीजी के भाषण को प्रशंसा में पृष्ठों के पृष्ठ रंग दिए। स्वामीजी के व्यक्तित्व और उनकी भाषण-शेली की चर्चा भी पत्रों में खूब जोर- शोर से चल पड़ी । न्यूयार्क हेरल्ड ने लिखा था कि स्वामी विवेकानन्द में भाषण को दिव्य शक्ति है। भाषण की शक्ति को दिव्यता के रंग में देखना अमे- रिकन पत्रों के लिए नई बात थी।
Tyas हेरल्ड ने एक स्थान पर यह भी लिखा-- 'निस्सन्देह स्वामी विवेकानन्द का स्थान धर्म-परिषद् में सबसे ऊंचा है ।'
हावडं यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने जब आपका भाषण सुना तो वह आपसे कह उठा-स्वामीजी, आपसे प्रमाणपत्र की पूछ करना सूर्य से उसके प्रकाशित होने का ग्रधिकार-पत्र मांगने के बराबर FATT का काम हैं
परिषद् के भाषण के बाद अमेरिका के भिन्त- भिन्त शहरों में स्वामीजी के व्याख्यातों की धूम मच गई । आपने अमेरिका के अन्य नगरों-उपनगरों में भी भ्रमण करके अनेक व्याख्यान दिए । व्याख्यानों का यह क्रम लगातार दो वर्ष तक चलता रहा । अमेरिका में दो वर्ष रहने के बाद आप लन्दन के लिए रवाना हुए । लन्दन में भी आपने बहुत शीघ्र सम्मान प्राप्त कर लिया | इंग्लैंड के धर्मप्राण व्यक्तियों ने ्रापका हृदय
३२ स्वामी विवेकानन्द यमन य की से सत्कार किया । यहीं आपका परिचय मिस मारग- रेट नोबल से हुआ, जो बाद में भगिनी निवेदिता के नाम से प्रसिद्ध हुई । स्वामीजी के उपदेशों से प्रेरणा पाकर आपने हिन्दू-धर्म की दीक्षा ली श्रौर शेष जीवन भारत में रहते हुए व्यतीत किया ।
एक दिन स्वामीजी संस्कृत के अंग्रेज विद्वान् प्रोफेसर मैक्समूलर से मिलने के लिए आक्सफोर्ड गए | प्रोफेसर मैक्समूलर ने श्रीरामकृष्ण परमहंस का नाम तो सुना ही था और उनके प्रति वे श्रद्धालु भी थे, उनके पट्टशिष्य से मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुए । एक दिन उनके साथ बिताकर आप जब ग्राक्सफोर्ड स्टेशन पर आए तो वर्षा शुरू हो गई थी । गाड़ी प्लेटफार्म पर आ गई श्रौर आप उसमें बैठ गए तो आपने देखा, प्रोफेसर मेक्समूलर स्वयं चले आा रहे थे । स्वामीजी ने कहा--
“आपने बहुत कष्ट किया । मैं तो स्वयं आक्सफोई स्टेशन पर पहुंच गया था। इस वर्षा में ग्राप स्टेशन तक आए, इस कष्ट के लिए मैं लज्जित हूं ।”
मैक्समूलर ने स्वामीजी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए उत्तर feat
स्वामीजी रामकृष्ण परमहंस के पट्टशिष्य होने के नाते ATT सत्कार करना मेरा कर्तव्य है । ऐसे अवसर
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बन
स्वामी विवेकानन्द च ३३
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रोज़ नहीं ग्राते। मुझे आपसे मिलकर ग्रपार श्रानन्द हुआ । प्रापको कुछ भी सहायता कर सकूंगा, तो अपने आपको कृतकृत्य मानूंगा 1"
लंदन में आप बहुत दिन रहे । यहां आपके बहुत- से भक्त बन गए । दर्शन के लिए ग्रानेवालों का क्रम बना ही रहता था। फिर भौ स्वामीजी के मन में अभिमान लेश-मात्र भी नहीं श्राया था | आप सर्वे- साधारण से बड़े प्रेम से मिलते थे । गरीब-अमीर सबको एक-समान प्रेम करते थे; बल्कि गरीबों से मिलकर ही उन्हें ्रधिक आनन्द मिलता था।
इस बहुत लम्बे प्रवास के बाद आपका स्वास्थ्य गिर गया । स्वास्थ्य-सुधार के लिए आपको स्विटजर- लेंड जाना पडा | यहां कुछ दिन रहने के बाद आप इटली, फ्रांस, जमनी आदि देशों में भी गए ।
उन दिनों की एक घटवा से स्वामीजी की स्मरण- शक्ति के चमत्कार का पता लगता है। जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान् प्रोफेसर पाल ड्यूस ने स्वामीजी को घर बुलाया था । कुछ देर की बातचीत के बाद प्रोफेसर को बाहर जाना पड़ा । स्वामीजी एक पुस्तक के पढ्ने में मग्न हो गए । प्रोफेसर १५-२० मिनट के बाद वापस भ्रा गया । वह स्वामीजी के पास आकर बैठ गया । स्वामीजी का ध्यान तो पुस्तक में था, उन्हें
३४ स्वामी विवेकानन्द
प्रोफेसर के वापस आने का और पास बैठने का पता ही न लगा । उनकी नजर पुस्तक पर थी; पुस्तक की पृष्ठसंख्या ४०० से कम नहीं थी; स्वामीजी बहुत जल्दी-जल्दी पुस्तक के पन्ने पलटते जाते थे । घण्टे-भर में स्वामीजी ने उस ४०० पृष्ठों की पुस्तक का पारा- यण कर लिया । प्रोफेसर ड्यूस ने भी उनके पुस्तक- पाठ में विघ्न डालना उचित नहीं समझा । जब स्वामी- जी पुस्तक पढ़ चुके तो प्रोफेसर ने विनोदात्मक रीति से पूछा--
“स्वामीजी ! आपने ४०० पृष्ठ समाप्त कर लिए । इतने में तो पुस्तक के पन्ने ही पलटे जा सकते हैं । राप पुस्तक के पन्ने पलटने में ही मग्न हो गए ।”
स्वामीजी समझ गए कि प्रोफेसर का भ्रभिप्राय स्वामीजी को यह परामर्श देने से था कि पुस्तक का पाठ किया जाए तो ध्यान से करना चाहिए । जल्दी- जल्दी पढ्ने से कुछ भी स्मरण नहीं रहता । हंसते हुए स्वामीजी ने उत्तर दिया--
“मैने पन्ने नहीं पलटे, ध्यान से पुस्तक का पाठ किया है । श्राप चाहें तो मैं यह भी बतला सकता हु कि किस पृष्ठ पर कौन-से विषय की चर्चा ह् ।”
प्रोफेसर को विश्वास न हुआ । उसने अपना कौतूहल शान्त करने के लिए स्वामीजी से कई प्रश्न
स्वामी विवेकानन्द ३५
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किए | स्वामीजी ने उनका ठीक-ठीक उत्तर दे दिया । प्रोफेसर के HAA की सीमा न रही | उसने पूछा--
“आपमें स्मरण-शक्ति का ऐसा चमत्कार है, यह मुझे मालूम नहीं था । यह सिद्धि श्रापको केसे हुई ? क्या इसके लिए विशेष साधना नहीं करनी पड़ती ?
स्वामीजी ने उत्तर दिया “विशेष साधना की कोई आवश्यकता नहीं, ब्रह्मचर्य के साधन से यह लाभ स्वयं हो जाता है । आप जानते ही हैं, मैं संन्यासी हूं । Wa: ब्रह्मचर्यं का पालन मेरे लिए आवश्यक है । श्राप विश्वास करें या न करे, ब्रह्मचय से मनुष्य को स्मरण- शक्ति बहुत तीव्र होती है और वीयनाश से शक्ति का क्षय होता है।'
जर्मनी में कुछ दिन रहने के बाद आप फिर इंग्लेंड वापस चले गए । वहां इंग्लेंड के छोटे-छोटे शहरों में घुम-घूमकर आपने वेदान्त के सिद्धान्तों का प्रचार किया ! लोग ग्रापकी भाषण-शेली से बहुत प्रभावित होते थे । अंग्रेजी भाषा पर आपका इतना अधिकार देखकर स्वयं ग्रंग्रेज हैरान रह जाते थे ।
इस तरह चार वर्ष यूरोप व अमेरिका में हिन्दू- धर्म की विशेषताओं का प्रचार करने के बाद स्वामीजी ने स्वदेश वापस आने का निश्चय किया । आपके साथ आपके अनेक भक्त भी भारत आने के लिए तेयार
३६ स्वामी विवेकानन्द OOD. POO OO,
Bi rit oO 000 0 oto 55 55 5 हो गए, भगिनी निवेदिता भी उनमें से एक थीं |
स्वदेठा-आगमन
स्वामी विवेकानन्द ने जब इंग्लेंड से भारत आने का निश्चय किया तब तक भारत में भी आपका यश चारों ओर फैल चुका था। चार वर्ष पूर्वं जब आप भारत से शिकागो गए, बहुत थोड़े लोग आपके नाम से परिचित थे । शिकागो धर्म-परिषद् और बाद में यूरोप की ख्याति ने भारतीय हृदय में आपके लिए बहुत ऊंचे स्थान की भावना पैदा कर दी थी । लाखों भारतीय आपके दर्शनों को उत्सुक हो गए थे । aes वापस आने का समाचार सुनते ही वे आपके भव्य स्वागत का आयोजन करने लगे। ग्राज से पूर्व किसी संन्यासी ने यूरोप में भारतीय संस्कृति का सम्मान नहीं बढ़ाया था । स्वामी विवेकानन्द इस कार्य में सबसे अग्रणी थे |
सीलोन की राजधानी कोलम्बो में श्रापका जहाज जब बन्दरगाह में ठहरा तभी हजारों लोगों ने आपके जयधोष से आकाश को गुंजा दिया | सीलोन के प्रसिद्ध नेता कुमारस्वामी ने सीलोनवासियो की ओर से आपके गले में फूलों की माला डाली । स्वामीजी इस सत्कार को देखकर चकित रह गए । उन्होंने ऐसे विशाल स्वा-
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गत की कल्पना भी नहीं को थी ।
जहाज से उतारकर लोग श्रापको एक विशाल सभा में ले गए । वहां आपका भाषण सुनने के लिए सहस्रो श्रादमी मौजूद थे। सभा में भाषण देते हुए आपने कहा--
“मैं कोई राजा-महाराजा नहीं हूं, श्रीमन्त भी नहीं हूं और कोई प्रसिद्ध नेता भी नहीं हूं । मैं तो केवल एक ऐसा संन्यासी हूं जिसने संसारी जीवन के बन्धनो से विरक्त होकर लोक-सेवा में ग्रपना जीवन अपित कर दिया है । आपने मेरे प्रति जो सम्मान दिखाया है, मैं उसे अपने व्यक्तित्व के प्रति नहीं, बल्कि हिन्दू-संस्क्रति के प्रति मानता हूं | आपका TATA देखकर मेरा मन arated हो गया है। भारत गरीब है किन्तु इस गरीबी से हमें लज्जित होने की आवश्यकता नहीं। हमारी श्रात्मा गरीब नहीं है, हमारी संस्कृति wa भी बहुत सम्पन्न है । अपनी संस्कृति के बल पर गाज भी हम संसार के देशों के सामने ग्रपना माथा ऊंचा कर सकते =
सीलोन में उतरते हुए स्वामीजी ने जिस स्थान पर प्रथम चरण रखे थे, उस स्थान पर रामनन्द के राजा साहब ने स्मारक बनवाकर उनके इस स्वदेशागमन को याद को अमर बना दिया । यह स्मृति-स्तम्भ आज भी
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वहां मौजूद है ।
कुछ दिनों तक सीलोन का भ्रमण करने के बाद स्वामीजी मद्रास पधारे । मद्रास की जनता ने भी अपूर्व उत्साह से उनका स्वागत किया । मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश माननीय सुब्रह्मण्येयर की भ्रध्यक्षता में एक स्वागत-समिति बनाई गई। मद्रास के स्टेशन पर आपकी गाड़ी के लगते ही हज़ारों लोग आपके स्वागत को उमड़ पड़े । फूलों की मालाग्रों से स्टेशन का प्लेट- फार्म भर गया । जयघोष से आकाश गूंज उठा |
वहां से चलकर आपने सभा में भाषण दिया | आपने कहा--
“ग्राज की धर्म-रहित शिक्षा हमें जीवन के मार्ग में बहुत सहायक नहीं होती । इस शिक्षा से हमारे युवकों के चरित्र नहीं बनते । जो शिक्षा सच्चरित्र न बनाकर दुश्चरित्र बनाने में सहायक होती है वह त्याज्य तेशी जिसे अपने निर्माण व उत्कर्ष की ही चिन्ता नहीं होगी, वह देश का उत्कर्ष करने में योग नहीं दे सकता । युवकों को पुस्तक के ज्ञान की श्रपेक्षा चरित्र-निर्माण पर विशेष बल देना चाहिए ।”
मद्रास में कुछ दिन ठहरने के बाद स्वामीजी कलकत्ता की A रवाना हो गए । कलकत्ता स्वामीजी का जन्मस्थान था; वहां के लोगों ने बड़े प्रेम से श्रापका
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स्वामी विवेकानन्द
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स्वागत किया |
रामकृष्ण मिठान की स्थापना
कलकत्ता पधारने के कुछ दिन बाद सर राधा- कान्त देव के घर में एक सभा का आयोजन हुआ । वहां राजा विजयक्ृष्ण ने कलकत्ता के धर्म-प्रेमी सज्जनों की ग्रोर से स्वामीजी की सेवा में मानपत्र भेंट करते हुए आपकी स्तुति की | आपने उस मानपत्र का उत्तर देते हुए कहा
“मैं अपने देश से दूर गया हुआ था, किन्तु मेरा मन देश में ही लगा था मैंने मोक्ष की प्राप्ति के लिए संन्यास नहीं लिया बल्कि भानव-सेवा के लिए ही लिया है। मैं भी आप सबके साथ मिलकर यह कहता हूं, 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।' अपनी जन्म- भूमि मुझे अपने मोक्ष से भी अधिक प्रिय है।'
कलकत्ता में चालम बाज़ार के एक मकान में स्वामीजी ने निवासस्थान बनाया । आपके दर्शनों के लिए जो सैकड़ों युवक श्राते थे, उन्हें आप देशकार्य में योग देने का निरन्तर उत्साह देते रहते थे । स्वामीजी का कथन था--
“दुनिया में रहनेवाले मनुष्यों के जो अनेक कतव्य
४० स्वामी विवेकानन्द ee eo ee हैं उनमें देश-सेवा का कर्तव्य सबसे ऊंचा है।” स्वामीजी के उपदेश से प्रभावित होकर ग्रनेक युवकों ने श्राजन्म देशसेवा का ब्रत ले लिया। वे संन्यासी हो गए। स्वामीजी उन्हें हर समय यही उपदेश दिया करते थे-- “संन्यासी का लक्ष्य दीन-दुखियों की सेवा करना हे और अपने सुखों को ठोकर मारकर मानव-जाति के कल्याण में सर्वस्व ATT कर देना है । जो संन्यासी ऐसा समर्पण नहीं करता, वह संन्यासी बनने का ग्रधि- कारी नहीं है, वह इस पवित्र नाम को कलंकित करता है।”
मानव-सेवा के इस लक्ष्य को आदर्श मानकर ही स्वामीजी ने 'श्रीरामकृष्ण मिशन? की स्थापना की । दरिद्रनारायण की सेवा करना ही मिशन का उद्देश्य था । इस मिशन को सफल बनाने के लिए स्वामीजी ने भ्रनथक परिश्रम किया ।
मिशन तो सफलता के मार्ग पर चल पडा, किन्तु अनथक मेहनत ने स्वामीजी को श्रस्वस्थ बना दिया । स्वास्थ्य-लाभ के लिए ्रापको फिर पर्वत-यात्रा करनी पड़ी । इस बार गाप श्रल्मोड़ा गए । उन दिनों मुशिदाबाद जिले में भयंकर दुष्क्राल पड़ा था | स्वासी- ` जी के तीन शिष्य इस दुष्काल की स्थिति का पता लगाने के लिए मुशिदाबाद भी गए |
स्वामी विवेकानन्द ४१ हकक प पे
अल्मोड़ा में कुछ दिन रहने के बाद श्राप सन् १८९८ में फिर कलकत्ता पधारे । कलकत्ता में श्राने से पूर्व आपने पंजाब और कलकत्ता के शहरों में भी भ्रमण किया । वहां कलकत्ता शहर से कुछ दूरी पर गंगा के पश्चिम किनारे, आपने बेलूर मठ की स्थापना की। वेलूर में रहकर आप युवक संन्यासियों और ब्रह्म- चारियों को वेदान्त, गीता, दर्शत आदि धर्म-ग्रन्थों का ग्रभ्यास कराते रहे । स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण ग्रापको फिर पर्व॑त-यात्रा करनी पड़ी । इस बार दाजि- लिग गए । इस बीच कलकत्ता में प्लेग फेल गई । सेकड़ों AAT प्लेग के ग्राक्रमण से मरने लगे । इस समाचार के मिलते ही आप दार्जिलिंग से कलकत्ता श्रा गए । प्लेग के रोगी को अकेला छोड़कर लोग जब उनसे दूर भाग जाते थे, तो स्वामीजी अपने शिष्यों- समेत वहां पहुंचकर रोगी की सेवा करते थे ।
इस कार्य में श्राथिक सहायता की भो आवश्यकता थी । किन्तु श्राथिक सहायता के लिए स्वामीजी किसी- के आगे हाथ पसारना अनुचित समझते थे । किसी सहयोगी ने उनसे पूछा--
“स्वामीजी, पेसा कहां से आएगा, और पेसे के अभाव में सेवा का काम केसे चलेगा ?”
स्वामीजी ने तुरन्त उत्तर दिया--
४२ स्वामी विवेकानन्द
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“पैसे की जरूरत होगी तो बेलूर मठ को बेच कर भी पेसा AT जाएगा | सेवा का काम पहला काम है । शहर में सेकड़ों ग्रादमी मृत्यु के ग्रास बन रहे हैं और मैं मठ में बैठकर विश्राम करूं, यह नहीं हो सकता ।”
इस उत्तर से उनके शिष्यों को सेवाकार्य में दुगुना उत्साह मिला ।
बेलूर मठ के बेचने की बात सुनकर भ्रनेक उदार- हृदय श्रीमन्तों ने सेवाकार्य में लाखों रुपयों की भेंट चढ़ा दी । इन रुपयों से स्वामीजी ने रोगियों की सेवा के लिए निःशुल्क श्रस्पताल खोल दिए ।
अपने जीवन-मरण की चिन्ता छोड़कर स्वामीजी तथा उनके शिष्यों ने कलकत्तावासियों की सेवा की । उस सेवा को कलकत्ता निवासी कभी भूल नहीं सकते ।
उन दिनों स्वामीजी को वेदान्त में इतनी दिलचस्पी नहीं थौ जितनी लोकसेवा और सामान्य मनुष्यों के दुःखों को हूर करने में थी । अपने शिष्यों तथा आगन्तुकों से आप वेदान्त को चर्चा न करके लोकहित की हो चर्चा किया करते थे ।
एक दिन 'हितवादी' पत्र के सम्पादक पण्डित सखाराम गणेश देउस्कर अपने एक मित्र के साथ स्त्रामोजी के SAAT को आए । उनके साथ भी स्वामीजी सारे समय लोकहित की चर्चा करते रहे। विदा होते
स्वामी विवेकानन्द a
हुए उनके मित्र ने स्वामीजी से कहा--
“स्वामीजी ! हम आपके पास धर्म-विषयक उप- देश सुनने आए थे | आपने तो सामान्य विषयों की चर्चा में ही सारा समय लगा दिया ।”
स्वामीजी ने मंद-मंद मुस्कराते हुए कहा-- “महाशय ! जिस देश में हज़ारों आदमी ग्रन्त बिना भूखे रहते हों, वहां धर्म की चर्चा गोण हो जाती है । जो धर्म भूखे मनुष्य को ग्रस्त न दे सके और रोती हुई विधवाओं के आंसू न पोंछ सके, उसे मैं धर्म नहीं मानता! '
स्वामीजी की इस बात का प्रभाव 'हितवादी' पत्र के सम्पादक पण्डितजी पर इतना पड़ा कि उन्होंने इस सम्बन्ध में अपने पत्र में चर्चा करते हुए लिखा--
“मुझे स्वामीजी की यह बात कभी नहीं भूलती जो उन्होंने उस दिन की भेंट में कही थी । उसी दिन से सच्चे देश-प्रेम और सच्चे धर्म का अर्थ समका Zl”
पुनः विदेदा-यात्रा
इस तरह दो वर्ष तक निरन्तर कार्य करने के बाद स्वामीजी फिर सन् १८९९ की तारीख २० जून को अ्रमेरिका में धर्म-प्रचार के लिए चल दिए । इस यात्रा सें भगिनी निवेदिता तथा आपके गुरुभाई स्वामी
४४ स्वामी विवेकानन्द
तुरीयानन्द भी आपके साथ थे ।
न्यूयाक में आपकी एक भक्त महिला मिसेज लिगेट ने ग्रापका अतिथि-सत्कार किया । वह उन्हें श्रपने घर ले गई ।
यहां से आकर न्यूयाके में स्वामीजी ने फिर भाषण-काये शुरू कर दिया । इस बार श्राप केवल भाषण ही नहीं करते थे--बल्कि जिस शहर में जाते, वहां के धर्म-प्रेमियों की सहायता से वेदान्त सोसायटियों की स्थापना भी करते थे । अमेरिका के भिन्न-भिन्न शहरों--न्यूयाकं, शिकागो, कैलिफोनिया ग्रादि में ग्रनेक वेदान्त सोसायटियां बन गई ।
क कुछ दिन बाद आपको पेरिस में एक धर्म-इतिहास- परिषद् में सम्मिलित होने का निमन्त्रण मिला । पेरिस जाने से पूर्व श्रापने जहाज की यात्रा में ही फ्रांसीसी भाषा का श्रभ्यास कर लिया और पेरिस पहुंचकर फ्रांसीसी भाषा में ही व्याख्यान दिया । इस सभा में इंग्लेंड, जर्मनी, इटली ग्रादि देशों के ्रनेकानेक विचारक उपस्थित हुए थे। उन सबने स्वामीजी की श्रद्भत प्रतिभा पर AAT प्रकट किया ।
तीन महीने तक श्राप पेरिस में ही रहे और वहां वेदान्त का ही प्रचार करते रहे। उसके बाद, आप बल्गेरिया, ग्रीस, टर्की आदि देशों में गए । मिस्र की
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स्वामी विवेकानन्द ४५
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राजधानी काहिरा में भी आप पहुचे ।
वहां से आप एक दिन अचानक ही भारत को आानेवाले जहाज पर सवार होकर बम्बई पहुंच गए | स्वागत-सत्कार के ्राडम्बरों से बचने के लिए AIA भगवे वस्त्र पहन लिए थे । बम्बई से कलकत्ता जाते हुए किसीको अपने art की सूचना भी नहीं दी और एक रात ग्रचानक ही आप बेलूर मठ में पहुंच गए ।
जीवन की कुछ घटनाएं
बंगाल के प्रसिद्ध लेखक श्री नगेन्द्रनाथ गुप्त ने जो स्वामीजी के साथ कई वर्षों तक घनिष्ठ सम्पक में रहे थे, अपने संस्मरण लिखते हुए स्वामीजी के जीवन की कुछ घटनाएं लिखी हैं । उनमें से दो-चार ये हैं--
स्वामीजी कश्मीर से लौटकर लाहौर आए थे। लाहौर के प्लेटफार्म पर सैकड़ों लोग आपके स्वागत के लिए आए थे । जिस डिब्बे में स्वामीजी थे, उसे लोगों ने घेर लिया था | उसमें से पहले एक यूरोपियन सज्जन उतरे और बाहर खड़े हो गए, उसके बाद स्वामीजी उतरे । युरोपियन ने झुककर स्वामीजी को प्रणाम किया । स्वामीजी ने उससे हाथ मिलाए और हंसते- हंसते उसे विदा दी। बाद में पता चला कि वह यूरो-
४६ स्वामी विवेकानन्द
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पियन भारतीय सेना का कनेल था । इंग्लेंड में स्वामी- जी के भाषणों से प्रभावित होकर उनका भक्त बन गया था |
उसी रात, जब स्वामीजी श्री नगेन्द्रनाथ गुप्त के घर पर Set थे तो देश की दशा की चर्चा छिड़ गई | स्वामीजी ने कहा--“देश के शिक्षित मध्यमवर्ग का समाज अभी तक जागरित नहीं है। इससे देश का कल्याण नहीं होगा | देश का भविष्य देश के किसानों व मजदूरों के ही हाथ में है ।”
एक दिन स्वामीजी ने श्री नगेन्द्रनाथ गुप्त को कहा था-- यदि मेरी जेलयात्रा से देश का कल्याण
द सकता हे, तो मैं निःसंकोच जेल जाने को तैयार हूं । उस समय तक श्रभी सत्याग्रह व सविनय-प्राज्ञा- भंग आन्दोलन का सूत्रपात भी नहीं हुआ था। उस समय भी स्वामीजी इतनी कुर्बानी करने को तैयार थे ।
१९०१ में स्वामीजी ढाका गए | ढाका के प्रख्यात जमींदार बाबू मोहिनी मोहनदास उन्हें अपने घर ले गए । वहां ब्रह्मपुत्र नदी में स्नान किया | वहां श्राप श्री परमहंस के एक शिष्य साधु नाग महाशय के घर भी गए । उस समय नाग महाशय को मृत्यु हो चुकी थी । उनकी विधवा धर्मपत्नी ने स्वामीजी का सत्कार किया । वापस आते हुए उसने एक दुपट्टा आपको भेंट
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स्वामी विवेकानन्द ४७ BN त्य हाल तती ल कनान. यी किया | राजा-महाराजाग्रों की लाखों रुपयों की भेंट को अस्वीकार कर देनेवाले स्वामीजी ने उस विधवा के ढाई गज़ के उपहार को सहर्ष स्वीकार कर लिया । स्वीकार ही नहीं किया उसे उसी समय सिर पर बांध- कर पूरा सम्मान भी दिया | ढाका पहुंचकर स्वामीजी का स्वास्थ्य फिर से बहुत खराब हो उठा था। वायु परिवर्तन के लिए आपको शिलांग जाना पड़ा। किन्तु शिलांग र पहुंचकर भी स्वास्थ्य में विशेष सुधार नहीं हुआ । फिर भी आपको श्रागन्तुक भक्तों से बातचीत करनी ही पड़ती थी । यह धर्मालाप जब शुरू होता था तो घण्टों तक
थोड़ा स्वास्थ्य सुधरने पर स्वामीजी अपने दो जापानी मित्रों के साथ बुद्धगया पधारे । वहां से कुछ भक्तों के आग्रह पर आप काशी भी गए । कुछ दिन काशी रहने के बाद अपने गुरु श्रीकृष्णदेव का जन्म उत्सव मनाने के लिए आप वापस कलकत्ता ग्रा गए । कलकत्ता से बेलूर मठ पहुंचकर आपने बड़े उत्साह
से उत्सव की तैयारियां शुरू कर दीं। उस उत्साह-उमंग और कार्यत॒त्परता को देखकर कोई व्यक्ति यह कल्पना नहीं कर सकता था कि स्वामीजी कुछ दिनों बाद ही
संसार त्याग देंगे ।
वह ईस्वी सन् १६०२ की ८ जुलाई का द्नि
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1st स्वामी विवेकातन्द
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AT | आज आप सबके संग पुजा करने नहीं TT | सोम- वार की ग्रमावस होने से श्रापने काली-पुजा की जाते की इच्छा प्रकट की । स्वामी श्रद्धानन्द थौर स्वामी बोधानन्द ने काली-पूजा का प्रबन्ध कर दिया । श्राप तीन घण्टे तक ध्यान में बैठे रहे । कुछ दिनों से स्वामीजी सबके संग भोजन नहीं करते थे, किन्तु ग्राज सबके साथ मिलकर भोजन किया । भोजन के ate आप विद्यार्थियों को शास्त्रों को शिक्षा देते थे । उस दिन ्रापने-श्रपने शिष्यों को बाहर शिक्षाभ्यास के लिए भेज दिया ग्रौर स्वयं हाथ में माला #लेकर जाप करने लगे। घड़ी में रात के € बजे थे । माला ग्रापके हाथ में थी । चारों ओर शान्ति थी मुख से श्रो३म् नाम की ध्वनि के साथ माला फेरते जाते थे । दो-चार शिष्य थोड़ी दूर बेठे विद्याभ्यास कर रहे थे। थोड़ी देर में शिष्यों ने देखा कि माला स्वामीजी के हाथ में है, कितु वह घूम नहीं रहो; स्वामीजी का माथा झुक गया है ओर चिबुक छाती से जा लगी है। इस तरह ईश्वर के एक भक्त ने संसार का त्याग
. कर दिया । संसारी वस्तुओं से मोह-त्याग तो वे वर्षों
पूर्व कर चुके थे, AT संसार का भी त्याग कर दिया । 11070 ७ ७ ७
सरल प्रेरणाप्रद जोवनियां
प्रत्येक का मूल्य ७५ पेसे
रवीन्द्रनाथ ठाकुर लाला लाजपतराय
स्वामो रामतीर्थ गुरु गोविन्दसिह
सरदार पटेल सदाचारी बच्चे डा० राजेन्द्रप्रसाद महापुरुषों का बचपन विनोबा भावे
जवाहरलाल नेहरू महात्मा गांधी
वीर पुत्रियां लालबहादुर शास्त्री Wiel बालक
हरिसिह नलवा area देवियां चन्द्रशेखर TMNT सच्चो देवियां श्यामाप्रसाद मुखर्जी सुन्दर कथाएं गुरु नानकदेव भारत के महान् ऋषि सुभाषचन्द्र बोस अच्छे बच्चे शिवाजी गौतम बुद्ध महाराणा प्रताप सम्राट अशोक चाणक्य वीर हनुमान् लोकमान्य तिलक हमारे स्वामी श्रीकृष्ण श्री अरविन्द ` स्वामी विवेकानंद बीर सावरकर कुछ WY पुस्तकं sto विश्वेशवरेया १°५० इन्दिरा गांधी २:०० 'हमारे राष्ट्रनिर्माता ` २:०० डा० जाकिर हुसेन २:०० स्वामी श्रद्धानन्द १:५० ये महान् कंसे बने goo ,
. राजपाल एण्ड सन्ज, दिल्ली द्वारा प्रकाशित .